UAPA के तहत जेल में एक्टिविस्टों की रिहाई के लिये कई शहरों में प्रदर्शन, सामाजिक संगठन बोले ‘हम लड़ेंगे उदास मौसम के खिलाफ’

नई दिल्लीः नारीवादी, जन संगठनों, कलेक्टिव्स, छात्रों, ट्रेड यूनियनों, खेत मज़दूरों, मछुआरों, आदिवासी, दलित और मुस्लिम समुदायों, विस्थापित लोगों, नागरिक अधिकार एक्टिविस्टों, मीडिया कर्मियों, शिक्षकों, युवाओं, और वे सब जो राजनैतिक उत्पीड़न को झेल रहें हैं, सब अनेकों  राज्यों से  विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से जुड़े और उन्होंने गुलफ़िशा फातिमा के साथ एकजुटता ज़ाहिर की। देश भर के अनेकों शहरों, दिल्ली, मुंबई, बंगलुरु, हैदराबाद, अरेरिआ, पटना, लखनऊ, फैज़ाबाद, मुज़फ्फरनगर, सहारनपुर, बड़वानी, बरोदा, जयपुर, पुणे, भोपाल, भिलाई, कोलकाता, सीतापुर इत्यादि में एकजुटता कार्यक्रम आयोजित किये गए।

गुलफ़िशा को 9 अप्रैल 2020 को गिरफ्तार किया गया था। उनपर चार एफआईआर दर्ज कर उन पर पर यूएपीए  जैसी गंभीर धाराएं लगाई गईं हैं। इसके साथ ही गुलफ़िशा पर 302, 307, आर्म्स कानून की धाराओं में भी मुकदमा दर्ज है। गुलफ़िशा को बाकी सब मामलों में ज़मानत मिल गई है, लेकिन वह अभी भी यूएपीए के तहत जेल में बंद हैं। इस क़ानून को नागरिकों के मूलभूत संवैधानिक और कानूनी अधिकारों को ख़त्म करने के लिए जाना जाता है।

 

समाजिक संगठनों के लोगों के मुताबिक़ गुलफ़िशा की कैद एक अपवाद नहीं है। यह वर्तमान सरकार द्वारा जनतांत्रिक और विरोध की आवाज़ों के दमन की डरावनी प्रक्रिया का हिस्सा है। गुलफ़िशा की ही तरह और बहुत जैसे कि इशरत जहां, तस्लीम अहमद, अतहर ख़ान, उमर खालिद, शरजील इमाम, सलीम खान, खालिद सैफी, ताहिर हुसैन और शिफा उल रहमान भी लम्बे समय से जेलों में कैद हैं।

हम लड़ेंगे साथी उदास मौसम के खिलाफ

इन सबकी रिहाई के लिये देश के विभिन्न इलाकों में 9 अक्टूबर कई प्रोग्राम किये गए। एक पार्क में दिल्ली दंगों के आरोप में झूठ मामलों में फंसाए गए सोशल एक्टिविस्टों पर चर्चाएं और क्रांति और विरोध के गीत गाए गए। कई जगह विरोध में जलूस निकाले गयेऔर कई जगह लोगों ने कॉमरेडों के साथ एकजुटता में शांतिपूर्ण तरीके से नारे लगाए। कई शहरों  में सडकों पर विरोध, प्रेस कॉन्फरेन्सेस, सार्वजनिक बैठकें, कैंडल लाइट विजिल, रैलियों, इत्यादि के माध्यम से और कई जगह पोस्टरों, वक्तव्यों और विरोध और कला के ऑनलाइन तरीकों को अपनाया गया। समाजिक संगठनों के लोगों ने कहा कि हम आशा करते हैं कि इन विरोध के गीतों, क्रांति के नारों की आवाज़ जेल की दीवारों के पार गुलफिशा और बाकी सब तक पहुंचेगी, वे जानेंगे कि राज्य सत्ता लोगों को कैद कर सकती है पर हमारे जोश और भावनाओं को नहीं, हम लड़ेंगे साथी उदास मौसम के खिलाफ।

दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस

दिल्ली दंगों के आरोप में जेल में बंद लोगों की रिहाई के लिये आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में वक्ताओं ने इस मौके पर न केवल गुलफिशा के बारे में बात रखी बल्कि बाकी सब लोग जो झूठे आरोपों के तहत जेलों में बंद हैं उन सबके बारे में भी बात की। उमा चक्रवर्ती की अध्यक्षता में आयोजित इस प्रेस कांफ्रेंस में सोशल एक्टिविस्ट एंव कवि नबिया ख़ान, एक्टिविस्ट अपेक्षा प्रियदर्शिनी, भाकपा माले की नेता कविता कृष्णन, सोशल एक्टिविस्ट एंव दिल्ली दंगों के आरोप में यूएपीए के तहत जेल में ख़ालिद सैफ़ी की पत्नी नगसिस सैफ़ी, पत्रकार आरफ़ा ख़ानम, गुफ़िशा के पिता, अतह ख़ान की माता, नूरजहां ने शिरकत की।

मुसलमानों और महिलाओं के ख़िलाफ है क़ानून

नाबिया खान ने प्रेस कांफ्रेंस को सम्बोधित करते हुए कहा कि इस कार्यक्रम के शीर्षक को समझें। यह देश अल्पसंख्यकों, मुसलमानों, दलितों और औरतों के लिए आज़ाद नहीं है। गुलफशा को जेल में बंद करना मुस्लिमों और औरतों पर एक संगठित हमला है। राज्य सत्ता मुस्लिम औरतों को नियंत्रण में रखना चाहती है। राज्य सत्ता यह कहानी गढ़ती है की मुस्लिम औरतों को बचाने के ज़रुरत है। शाहीन बाग़ ने इस कहानी का रुख ही पलट दिया। सीएए, एनआरसी, एनपीआर केवल एक कानून के खिलाफ ही लड़ाई नहीं है बल्कि मुसलामानों और औरतों  के लिए बराबर के नागरिक होने की लड़ाई है। न्याय के लिए ज़रूरी है कि न केवल सीएए विरोधी प्रदर्शनकारी आज़ाद हों बल्कि दिल्ली के जन संहार के आरोपियों को भी सज़ा हो।

बासो की अपेक्षा प्रियदर्शिनी ने एक सवाल से शुरुआत की।  उन्होंने कहा कि हाल ही में यूएपीए के एक आरोपी को 12 साल जेल में रहने के बाद ज़मानत मिली। कौन इन 12 सालों की कैद की भरपाई करेगा। गुलफिशा के 18 महीनों की ज़िम्मेवारी कौन लेगा? उन्होंने कहा कि राज्य और न्यायपालिका में उनका विश्वास कमज़ोर हुआ है। दिल्ली के दंगों में पुलिस की भूमिका की जांच की ज़रुरत है। यूएपीए के अंदर कैद किये गए ज़्यादातर लोग मुस्लिम, दलित और आदिवासी हैं। यदि हम सच्चा जनतंत्र चाहते हैं तो नागरिकता के लिए संघर्ष का अपराधीकरण नहीं किया जा सकता। संवैधानिक नैतिकता को विकसित किया जाना ज़रूरी है।

जज का ट्रांसफर सवालों के घेरे में

कविता कृष्णन ने कहा कि हाल ही में उच्च न्यायलय ने साफ़ तौर से सवाल उठाये हैं कि विरोध प्रदर्शनों पर यूएपीए के आरोप क्यों लगाए गए हैं। उन्होंने सहयोगी सेशंस जज, विनोद यादव का नाम लिया जिन्होंने 12 मामलों में बहुत ईमानदारी से फैसले सुनाये और पुलिस की जवाबदेही के मुद्दे को उठाया। अब इस वजह से उनका तबादला कर दिया गया है। जो जनतांत्रिक अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं वे  जेलों के अंदर हैं और जो खुलेआम मारने की धमकियां दे रहें हैं वे बाहर घूम रहें हैं। लेकिन यह सब हमें डरा नहीं सकता। इन सब का जेलों के अंदर का संघर्ष और इन के परिवारों का जेलों के बाहर संघर्ष जारी है और जारी रहेगा।

दमित लोगों के लिये आवाज़ उठाना है ख़ालिद का जुर्म

नरगिस सैफी ने खालिद को जेल के अंदर दी गई यातनाओं के बारे में बताया। कैसे उसे व्हीलचेयर पर लाया गया। वह सबसे पहले बंदी बनाये जाने वालों में से  था और जब उसे ज़मानत मिलने ही वाली थी कि उसे धारा 59 /20  के अंदर फिर गिरफ़्तार कर लिया गया। नरगिस ने कहा कि उन के पति का केवल एक ही जुर्म  था  कि वह दमित लोगों की लड़ाई लड़ रहे थे। मेरे पति ने मुझे इन संघर्षो से वाकिफ़ कराया। इस तरह में और लोगों से मिली जिस से मेरी हिम्मत बढ़ी और यह सब सहने का हौसला मिला। जिन्होंने दंगों के दौरान लोगों के मदद करने की कोशिश की उन्हें ही जेल में डाल दिया।

नरगिस ने बताया कि ख़ालिद की फेसबुक की आखरी पोस्ट दंगों में ज़ख़्मी लोगों की मदद के लिए एम्बुलेंस मनवाने के लिए थी। नरगिस ने यह सवाल भी उठाया कि उसके बच्चों का क्या दोष है जो 20 महीनें से अपने बाप का इंतज़ार कर रहें हैं। आज हम्मरे बच्चें यह सह रहें हेंहें पर अगर ख़ालिद ने यह लड़ाई नहीं लड़ी होती तो यह न जाने कितनो का हश्र होता। यदि ख़ालिद औरों के लिए खड़े नहीं होते तो आज और सब भी उनके लिए खड़े नहीं होते। हमें एक दुसरे के लिए खड़े होना है, एक दुसरे के लिए आवाज़ उठानी है। हमें इस दमन को रोकना होगा हमे यू। ए। पी। ए। को ख़त्म करने की मांग करनी होगी। किसी को भी ऐसा सहन न करना पड़े जो मेरे पति और परिवार को सहना पड़  रहा है।’

गुलफ़िशा के लिये आए हैं

आरफ़ा ख़ानम ने कहा कि आज वह यहाँ गुलफ़िशा के लिए आयीं हैं क्योंकि गुल हमारी लड़ाई लड़ रही हैं। ‘मैंने दिल्ली की हिंसा देखी है। में एक्टिविस्ट नहीं हुईं पर एक एक्टिव पत्रकार हूँ जो ज़मीर की आवाज़ को सुनती है। में यहाँ अपने सीएए/एनआरसी  आंदोलन के अनुभव को बांटना चाहती हूँ  और बताना चाहती हूँ  कि गुलफ़िशा हमारे लिए क्यों इतनी  ज़रूरी है और राज्य सत्ता के लिए इतनी खतरनाक क्यों है। अभिवक्ति की आज़ादी के बिना लोकतंत्र मर जाता है। आज हम यहाँ लोकतंत्र को बचाने के लिए इकठ्ठा हुए हैं। जब राज्य उनके साथ अमानवीय व्यवहार करता है तो हमारी यह ज़िम्मेवारी है कि हम उनके साथ मानवीय हो।  गुलफशा अपनी आज़ादी खो कर हमारी आज़ादी बचाने में लगी है। हम सब गुल के कर्ज़दार हैं।

गुलफ़िशा के अब्बू ने बताया कि उस के जेल जाने से वे किस प्रकार सदमे में आ गये और इस सब ने उन्हें मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक रूप से बुरी तरह से प्रभावित किया है। उन्हें लगता है कि अगर ग़ुल को रिहा नहीं किया जाता तो वो लम्बा नहीं जी पाएंगे। यदि वो रिहा हो जाती है तो वो शायद उनका यह दर्द और तनाव कम हो जाए। वो इस उम्मीद में है कि ऐसा जल्दी ही होगा।

महामारी के कारण रुका आंदोलन

अतहर ख़ान की अम्मी नूरजहाँ ने कहा कि इस महामारी की वजह से यह आंदोलन रुक गया है, पर ख़त्म नहीं हुआ है। इस महामारी के ख़त्म होने के बाद यह फिर से शुरू होगा। पहले हम बहुत सारे लोगों जैसे की उमर ख़ालिद, ख़ालिद सैफ़ी और दूसरों को नहीं जानते थे पर इन संघर्षों ने हमें एक दुसरे के करीब ला दिया है। आज हम एकजुटता के साथ खड़े हैं। यह बहुत ज़रूरी है।  वो अपने बेटे के साथ और बाकी सब के साथ खड़ी हैं जो सीएए विरोधी आंदोलन का हिस्सा थे। और जब यह जेल से रिहा होंगे तब भी हम इनके साथ मजबूती से खड़े होंगे। इस्लामॉफ़ोबिक, फासीवादी और जातिवादी ताकतों  के खिलाफ संविधान के लोकतान्त्रिक मूल्यों को बचने के लिए हमारा संघर्ष जारी रहेगा।

सामाजिक कार्यकर्ताओं की मांगें

सामाजिक संगठनों के लोगों ने इस प्रेस कांफ्रेंस में मांग रखी कि  गुलफ़िशा फातिमा, इशरत जहां, तस्लीम अहमद, मीरान हैदर, शादाब अहमद, अतहर ख़ान, उमर ख़ालिद, ख़ालिद सैफी, ताहिर हुस्सैनौर शिफा-उर-रहमान को तुरंत रिहा किया जाए। साथ ही सीएए, एनआरसी, एनपीआर, यूएपीए, देशद्रोह के कठोर कानूनों को रद्द किया जाए। दिल्ली दंगों की जांच कर दंगों के असल गुनहगरों को जेल में डाला जाए।

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