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पिता के निधन पर कोर्ट ने CAA आंदोलनकारी नताशा नरवल को दी ज़मानत, तीन सप्ताह रहेंगी जेल से बाहर

कृष्णकांत

‘प्रदर्शन करने के जुर्म’ में जेल काट रहीं नताशा नरवाल के पिता महावीर नरवाल की कल मौत हो गई थी। आज कोर्ट ने पिता के अंतिम संस्कार के लिए नताशा को तीन हफ्ते की अंतरिम जमानत दी है। नताशा नरवाल और सफूरा जरगर जैसी कई लड़कियों को इसी ‘प्रदर्शन के जुर्म’ जेल में डाल दिया गया था। उनमें से कुछ कई महीने जेल में रहीं, कुछ अब भी जेल में हैं। उन्हें जेल में क्यों डाला गया? प्रदर्शन तो पूरे देश में हुए थे! फिर डीयू और जामिया में पिंजड़ा तोड़ संगठन से जुड़ी कुछ लड़कियों को निशाना क्यों बनाया गया? प्रदर्शन करना अपराध कबसे हो गया?

प्रदर्शन महीनों चले थे लेकिन किसके भाषण के बाद दंगा हुआ? उस दंगे में सैकड़ों युवाओं पर मुकदमे ठोंक दिए गए और कोर्ट के आदेश के बावजूद उस दंगाई भाषणबाज पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? इसी तरह एक अन्य साजिश में सुधा भारद्वाज, आनंद तेलतुंबड़े, गौतम नवलखा, वरवरा राव और रोना विल्सन जैसे कई बुद्धिजीवियों को फंसाया गया था। इनमें फादर स्टेन स्वामी जैसे बुजुर्ग भी हैं। आरोप हैं कि ये लोग प्रधानमंत्री की हत्या करने की साजिश रच रहे थे। कई सारे बुजुर्ग और बुद्धिजीवी, 83 साल का पार्किंसन का मरीज और कई सामाजिक कार्यकर्ता मिलकर प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश रच रहे थे, यह सुनकर कोई भी हंस देगा। लेकिन उन लोगों को अब भी जमानत नहीं दी गई है।

एनआईए ने दावा किया कि इनमें से कुछ के लैपटॉप में कुछ फाइलें मिली हैं। अमेरिका के मेस्सचुस्सेट्स स्थित डिजिटल फोरेंसिक कंपनी आर्सेनल कंसल्टिंग ने जांच के बाद पाया कि विल्सन के लैपटॉप में 10 फाइलें मैलवेयर द्वारा डाली गई थीं, जिनमें वह ई-मेल भी था, जिसमें प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश बात कही गई थी। बहरहाल, वे कई बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता अब तक जेल में हैं। यह सब क्यों किया जा रहा है? दरअसल ये आपका और आपकी नागरिकता का इम्तहान है। ये इम्तहान है कि आप कितने न्यायप्रिय और लोकतांत्रिक हैं, कितना जुल्म सह सकते हैं।

अगर कुछ निर्दोष लड़कियों और कुछ बुजुर्ग बुद्धिजीवियों पर किए गए जुल्म को आप बर्दाश्त कर लेंगे तो आप पर उससे भी बड़े जुल्म किए जा सकते हैं। नागरिकता से जुड़ा एक काला कानून लाया गया। उसकी आड़ में एक सांप्रदायिक खेल खेला गया। एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में धर्म के आधार पर नागरिकता का प्रावधान किया गया। उसका विरोध करने वाले कुछ नागरिक पुलिस गोलीबारी में मारे गए। बाद में प्रदर्शन करने के जुर्म में तमाम लोगों को जेल में भर दिया गया, उनपर मुकदमे लाद दिए गए।

यह सब देश ने बर्दाश्त कर लिया, किसानों के खिलाफ लाए गए कानून को देश ने बर्दाश्त कर लिया। अब ताजा मामला ये है कि हम आप आक्सीजन, दवाई, अस्पताल और बिस्तर के बगैर मर रहे हैं और सरकार इस तरफ से बेपरवाह होकर चुनाव लड़ती है, भाषणबाजी करती है, मन की बात करती है और ट्विटर ट्विटर खेलते हुए मस्त रहती है।

हमारी सहनशक्ति बहुत ज्यादा है, इसलिए सरकार का विश्वास सातवें आसमान पर है। हमने संविधान का सांप्रदायिकरण सहा, हमने जनता का सांप्रदायिकरण सहा, हमने निर्दोष नागरिकों पर जुल्म सहा और अब अपनी मौतें बर्दाश्त कर रहे हैं। हम सदियों से अपने पर जुल्म करने वालों को बहुत प्यार करते रहे हैं। यही हमारा सच है। सरकार ये सब किए बिना भी महान हो सकती है और नागरिक ये सब सहे बिना भी अच्छे, सभ्य और समृद्ध नागरिक हो सकते हैं। कभी-कभी लगता है कि हम सब लोकतंत्र के नाम पर लोकतंत्र की लाश ढो रहे हैं।

(लेखक पत्रकार एंव कहानीकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)