क़ानून के दोहरे मापदंड: विनय धर्मांतरण करे तो बवाल, वसीम करे तो महिमामंडन

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भारत का संविधान हर बालिग नागरिक को अधिकार देता है कि वह कोई भी धर्म चुन सकता है। वसीम रिज़वी ने अपने उसी अधिकार का इस्तेमाल किया है। इसमें नया क्या है?

लेकिन इसी देश में डॉक्टर ज़ाकिर नाइक का बयान सुनकर और उनसे प्रभावित होकर कोई अपना धर्म बदलता है तो देश की मीडिया उसे धर्मांतरण का धंधा करार देती है। डॉक्टर ज़ाकिर नाइक पर सरकार द्वारा इतने मुक़द्दमे लाद दिए जाते हैं की उन्हें देश छोड़ कर जाना पड़ता है। डॉक्टर ज़ाकिर नाइक की एनजीओ “इस्लामिक रीसर्च फ़ाउंडेशन” IRF पर भारत सरकार द्वारा पाँच सालों का बैन लगा दिया जाता है।

इसी देश में उमर गौतम को धर्मांतरण के आरोप में जेल में ठूँस दिया जाता है। उमर गौतम द्वारा कराए गए धर्मांतरण को “अवैध धर्मांतरण” करार दिया जाता है, और वहीं यति नरसिंहानंद सरस्वती द्वारा कराए गए धर्मांतरण को पूरे देश की मीडिया बड़े गर्व से कवर करती है। ये भी जानने की कोशिश नहीं की जाती कि जिन्होंने उमर गौतम से प्रभावित होकर धर्मांतरण किया है उन्होंने अपनी मर्ज़ी से धर्मांतरण किया है या उनका जबरन धर्मांतरण करवाया गया है।

इसी देश में अभी हाल ही में कर्नाटक में बजरंग दल के लोग एक चर्च पर हमला कर देते हैं। उस चर्च पर भी धर्मांतरण करवाने का शक था। दिल्ली के द्वारिका में एक चर्च पर हमला होता है। वहाँ भी शक था की जबरन धर्मांतरण करवाया गया। कभी मस्जिद पर हमला होता है तो कभी इमामों को पीटा जाता है। कभी मज़ार तोड़े जाते हैं तो कभी पादरियों की हत्या कर दी जाती है। कभी गाय के नाम पर तो कभी धर्मांतरण के नाम पर देश भर में अल्पसंख्यकों पर आतंकी हमले किए जाते हैं।

इसलिए ये मत कहिए की वसीम रिज़वी ने धर्मांतरण कर के अपने अधिकार का इस्तेमाल किया है। क्यूँ की जिस तरह वसीम रिज़वी ने खुले आम पूरी मीडिया के सामने धर्मांतरण करके हिंदू धर्म अपनाया, आज के समय बहुसंख्यक समाज का कोई व्यक्ति ऐसे ही खुलेआम इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाता तो वो खुद और उसका धर्मांतरण करवाने वाले दोनों ही जेल की सलाख़ों के पीछे होते।

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