जन्मदिन विशेषः मिर्ज़ा ग़ालिब क्यूँ न फिरदौस में दोज़ख को मिला लें यारब, सैर के वास्ते थोड़ी सी जगह और सही

ध्रुव गुप्त

दिल्ली के निज़ामुद्दीन में मौज़ूद शायर मिर्ज़ा ग़ालिब की मज़ार दिल्ली की मेरी सबसे पसंदीदा जगह है। महानगर की बेशुमार भीड़भाड़ में जब भी अकेला महसूस करता हूँ, यह मज़ार मेरा भरोसेमंद साथी होता है। मिर्ज़ा ग़ालिब की मज़ार संगमरमर के पत्थरों का एक छोटा-सा घेरा भर नहीं, भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे बड़े शायर का स्मारक है। एक ऐसा स्मारक जिसमें अपने दौर से आगे सोचने और निकलने की ज़द्दोज़हद साँस लेती है। इस चहारदीवारी के भीतर वह एक शख्स मौज़ूद है जिसने ज़िन्दगी की तमाम दुश्वारियों और भावनाओं की जटिलताओं से टकराते हुए देश ही नहीं, दुनिया को वह  दिया जिसपर आने वाली सदियाँ गर्व करेंगी। मनुष्य के मन की गुत्थियों और अपने वक़्त के साथ उसके अंतर्संघर्ष का जैसा चित्र और स्थापित मान्यताओं के विरुद्ध जैसा विद्रोह ग़ालिब की शायरी में मिलता है, वह उर्दू ही नहीं विश्व की किसी भी भाषा के लिए गर्व का विषय हो सकता है। जब भी ग़ालिब की मज़ार की दीवार से लगकर बैठता हूँ, उन हज़ारों ख़्वाहिशों की दबी-दबी चीखों की आहटें महसूस होती हैं  जिनके पीछे ग़ालिब उम्र भर भागते रहे। अधूरे सपनों और नामुकम्मल ख्वाहिशों के एक वैसे सफ़र पर जो कभी किसी का भी पूरा नहीं होता।

ग़ालिब की मज़ार को निजामुद्दीन के भीडभाड वाले इलाके का एकांत कोना कहा जा सकता है। निजामुद्दीन के चौसठ खंभा के उत्तरी हिस्से में लगभग साढ़े तीन हज़ार वर्गफीट का यह परिसर लाल पत्थरों की दीवारों से घिरा है जिसमें सफ़ेद संगमरमर से बनी ग़ालिब की मज़ार है। पहले यहाँ सिर्फ उनकी कब्र हुआ करती थी। मज़ार और उसके आसपास की संरचना सबसे पहले 1955 में और उसके बाद कई किश्तों में की गई थी। उनकी मज़ार के पीछे उनकी बेगम उमराव बेगम की कब्र है जिनकी मृत्यु ग़ालिब की मृत्यु के एक साल बाद हुई थी। ग़ालिब की मज़ार में संगमरमर के एक पत्थर पर ग़ालिब का यह शेर दर्ज़ है-

न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता

डुबोया मुझको होने ने न होता मैं तो क्या होता!

ग़ालिब की मज़ार की सबसे ख़ास बात मुझे यह लगती है कि वहाँ दर्शकों की कोई भीड़ नहीं होती। कभी-कभी इक्का-दुक्का लोग ही वहाँ दिखते हैं। दिल्ली की बेशुमार भीड़ अपनी तमाम मन्नतें लिए पास ही स्थित हज़रत निजामुद्दीन और अमीर खुसरो की दरगाह की ओर मुख़ातिब होती है। मज़ार की वीरानी देखकर ग़ालिब का यह शेर ज़ेहन में आ जाता है-

कोई वीरानी सी वीरानी है

दश्त को देख के घर याद आया।

ग़ालिब की मज़ार के सटे उनके सम्मान में भारत सरकार द्वारा स्थापित ग़ालिब अकादमी है जहाँ दुनिया भर के उर्दू साहित्य का बड़ा संग्रह भी है और ग़ालिब के साहित्य और उनके जीवन से जुडी चीज़ों का एक संग्रहालय भी। ग़ालिब की हमेशा बंद रहने वाली मज़ार में प्रवेश करने के लिए अकादमी से चाभी हासिल करनी पड़ती है। मज़ार के आसपास की तंग गलियों में शोर और गन्दगी तो बहुत है, लेकिन मज़ार के अंदर प्रवेश करते ही वह सब कुछ भूल जाता है। ‘दीवान-ए-ग़ालिब’ के अलावा मिर्ज़ा ग़ालिब से अगर कभी अकेले में मिलना हो तो दिल्ली में इससे बेहतर जगह और कोई नहीं। यहाँ तक कि बल्लीमारन के गली क़ासिम जान की तंग और भीड़भाड़ वाली गलियों में स्थित उनकी हवेली भी नहीं।

‘दीवान-ए-ग़ालिब’ मेरी सबसे पसंदीदा किताब रही है। ग़ालिब की मज़ार पर, उनकी सोहबत में उसे पढ़ना मेरे लिए हमेशा एक अतीन्द्रिय अनुभव होता है। तब लगता है कि मैं ग़ालिब के लफ़्ज़ों को ही नहीं, उनके व्यक्तित्व, उनके अंतर्संघर्षों, उनके फक्कड़पन और उनकी पीड़ा को भी शिद्दत से महसूस कर पा रहा हूँ। वहाँ देर तक बैठने के बाद ग़ालिब से जो कुछ भी हासिल होता है उसे एक शब्द में कहा जाय तो वह है बेचैनी। रवायतों को तोड़कर आगे निकल जाने की बेचैनी। जीवन और मृत्यु के उलझे रिश्ते को सुलझाने की बेचैनी। दुनियादारी और आवारगी के बीच एक कामचलाऊ तालमेल बिठाने की बेचैनी। तनहाई को लफ़्ज़ों से भर देने की बेचैनी। इश्क़ के उलझे धागों को खोलने और उसके सुलझे सिरों को फिर से उलझाने की बेचैनी। उन तमाम बेचैनियों को निकट से महसूस करने का ही असर होता है कि सामने बैठे-बैठे कभी-कभी कब्र के नीचे उनका कफ़न भी मुझे हिलता हुआ महसूस होता है। यह भ्रम ही सही, लेकिन यह भ्रम बहुत खूबसूरत होता है।

अल्लाह रे ज़ौक़-ए-दश्त-नवर्दी कि बाद-ए-मर्ग 

हिलते हैं ख़ुद-ब-ख़ुद मिरे अंदर कफ़न के पाँव

ग़ालिब अपने मज़ार में बिल्कुल अकेले नज़र आते हैं। अपनी ज़िन्दगी में भी ग़ालिब को शायद अकेलापन ही पसंद रहा था। जीते जी उनकी ख्वाहिश यही तो थी –

पड़िए ग़र बीमार तो कोई न हो तीमारदार

और अगर मर जाईए तो नौहा-ख़्वाँ कोई न हो।

उनके इस अकेलेपन में ग़ालिब से मेरा घंटों-घंटों संवाद चलता है। एक अकेलेपन की दूसरे अकेलेपन से बातचीत। अज़ीब है कि उनसे कुछ सवाल करता हूँ तो तत्काल उसका जवाब भी मिल जाता है मुझे। शायद वर्षों तक साथ रहते-रहते एक तरह की टेलीपैथी काम करने लगी है हमारे बीच। एक और खूबसूरत भ्रम। पिछली सर्दियों में एक दिन देर तक उनके मज़ार पर बैठने और उन्हें पढ़ने-समझने के बाद मैं मज़ार के सामने की एक बेंच पर लेट गया था। सहसा मुझे लगा कि अपनी क़ब्र से मुँह निकालकर ग़ालिब मुझे एकटक घूरे जा रहे हैं। उनसे कुछ कहने की तलब हुई तो पता नहीं कैसे मेरे मुँह से यह शेर बेसाख्ता निकला –

कुछ तो पढ़िए कि लोग कहते हैं

कब से ‘ग़ालिब’ ग़ज़ल-सरा न हुआ।

पता नहीं वह  क्या था कि हवा के एक तेज झोंके ने मेरे बगल में पड़े उनके दीवान के पन्ने पलट दिए। सामने जो ग़ज़ल थी, उसके जिस शेर पर मेरी पहली निगाह पड़ी, वह यह था:

क्यूँ न फिरदौस में दोज़ख को मिला लें यारब 

सैर के वास्ते थोड़ी सी जगह और सही

दिल्ली में सल्तनत और मुग़ल काल के कई नायाब भवन और किलें मिलेंगे। सूफी संतों, बादशाहों और उनके कई-कई दरबारियों की मज़ारें भी। भूतिया कही जानेवाली कुछ मध्यकालीन इमारतें भी। दिल्ली ऐसे भव्य, शानदार इमारतों से भरी पड़ी है जिनके सामने खड़े होकर आपको अपने बौनेपन का एहसास बार-बार होगा। अगर दिल्ली की भीड़ में आपको ज़रा देर के सुकून, बहुत सारे संवेगात्मक अनुभवों और थोड़ी-सी रचनात्मक प्रेरणा की दरकार है तो कभी हो आईए मिर्ज़ा ग़ालिब की छोटी-सी मज़ार पर ! वहाँ पहुँचकर आप अपने को छोटा नहीं महसूस करेंगे। एक शायर के एकांत कोने में कुछ देर तक बैठने के बाद आपको लगने लगेगा कि आप उनसे मुख़ातिब भी हैं और उनके क़रीब भी। एक ऐसी अनुभूति जो आपको सदियों पहले भी ले जाएगी और वर्तमान की सभी जटिलताओं के पन्ने भी आपके सामने खोलकर रख देगी।

(लेखक पूर्व आईपीएस हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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