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महान स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर यूनिवर्सिटी बनाने की क़ीमत चुका रहा आज़म ख़ान का परिवार!

वसीम अकरम त्यागी

महान स्वतंत्रता सेनानी मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की 1400 बीघा जमीन को एक अदालत ने राज्य सरकार की संपत्ति घोषित कर दिया है। यह ऐसा फैसला है जिससे आज़म ख़ान की अब तक की सारी कमाई बर्बाद होती दिख रही है। अगर सरकार जौहर यूनिवर्सिटी को अधिग्रहीत कर ले तो इसमें भी हैरानी की बात नहीं है। क्योंकि यूपी सरकार की नज़रें पहले दिन से ही इस यूनिवर्सिटी पर हैं, यूनिवर्सिटी के संस्थापक आज़म ख़ान इस यूनिवर्सिटी को बनाने की क़ीमत आज तक चुका रहे हैं। वे 11 महीने से जेल में बंद हैं, उनकी पत्नी 10 महीने तक जेल में रहकर आईं हैं।

क्या इस परिवार को राजनीतिक द्वेष के कारण ही सताया जा रहा है? या यह परिवार एक महान स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर यूनिवर्सिटी बनाने की क़ीमत चुका रहा है? सवाल यह है कि क्या जौहर यूनिवर्सिटी सिर्फ आज़म ख़ान का ही नाम जुड़ा है? क्या इससे देश के तमाम परिवारों का नाम और अभिमान नहीं जुड़ा है जिनके परिवार वालों ने इस देश की आज़ादी के लिये यातनाएं झेलीं हैं, क़ैद काटी है, फांसी खाई है, गोलियां खाई हैं।

मौलाना जौहर जैसे महान स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर इस देश की सरकारों को यूनिवर्सिटीज़, शिक्षण संस्थान, अनुसंधान केन्द्र, बनाने चाहिए थे लेकिन उन्होंने नहीं बनाया। जब यह कार्य एक राजनेता ने किया तो उस संस्थान की राह में रुकावटों का पहाड़ खड़ा कर दिया गया। अब उसे सरकारी अधिग्रहण में लेने की योजना पर काम चल रहा है। सोचिए! इससे किसका नुक़सान होगा? वह विश्विद्यालय जो अल्पसंख्यक संस्थान के स्टेटस के साथ खड़ा है, जिसे बनाने के लिये आज़म ख़ान ने अपनी तमाम उम्र लगा दी उसके चले जाने से किसका नुक़सान होगा?

जौहर यूनिवर्सिटी को बनाने वाले आज़म ख़ान सभी के लिये रफीकुल क़ौम तो नहीं होंगे, हर इंसान की तरह उनके विरोधी और समर्थक दोनों ही हैं। लेकिन क्या देश में मौलाना जौहर के भी विरोधी हैं? क्या शिक्षण संस्थान के विरोधी भी हैं? क्या यूनिवर्सिटी के भी विरोधी हैं? इस देश में तमाम तरह की विचारधाराएं हैं, एक विचारधारा उत्तर प्रदेश देश में सत्तारूढ़ भाजपा की है। लेकिन इसके अलावा भी तो और सभी विचारधाराएं हैं। क्या उन तमाम विचारधारा के झंडाबरदारों को इस संस्थान को बचाने के लिये आगे नहीं आना चाहिए? क्या उत्तर प्रदेश के तमाम मुस्लिम ‘रहनुमाओं’ को दलगत राजनीति और ‘मसलकों’को किनारे कर इस संस्थान को नहीं बचाना नहीं चाहिए?

(लेखक पत्रकारिता से जुड़े हैं, ये उनके निजी विचार हैं)