आज़ादी क्या होती है, हमसे पूछो, क़ुर्बानियां तो हमने दी हैं: मौलाना अरशद मदनी

0
50

नई दिल्लीदारुल उलूम देवबंद में स्वतंत्रता देवस के अवसर पर आयोजित एक समारोह से संबोधित करते हुए दारुल उलूम देवबंद के अध्यापक प्रमुख और जमीअत उलमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने मातृभूमि की आज़ादी के लिए अपने बड़ों के बलिदान का उल्लेख करते हुए कहा कि आज़ादी ही नहीं देश की कोई भी तारीख़ भारत के उलमा के उल्लेख के बिना पूर्ण नहीं हो सकती है, भारत की आज़ादी का आंदोलन उलमा और मुसलमानों ने शुरू किया था, यहां की जनता को गु़लामी का अनुभव उस समय कराया था जब उसके बारे में कोई सोच भी नहीं रहा था, भारत में अंग्रेज़ों के खि़लाफ़ सबसे पहले बग़ावत का झण्डा उलमा ही ने उठाया था, हमारे बड़ों और उलमा ने देश की आज़ादी का शंख तब फूंका था जब दूसरे समुदाय सो रहे थे।

मौलाना मदनी ने यह भी कहा कि हम देश का मूल इतिहास जानबूझकर छिपाने वालों को यह भी बताना चाहते हैं कि दमनकारी अंग्रेज़ शासकों के खि़लाफ़ विद्रोह करने वाले यह हमारे बड़े ही थे जिन्होंने काबुल में एक नर्विसित सरकार स्थापित की थी, और इस सरकार का प्रधानमंत्री एक हिंदू राजा महेन्द्र प्रताप सिंह को बनाया गया था, क्योंकि हमारे बड़े धर्म से ऊपर उठकर केवल एकता और मानवता के आधार पर इस देश को गु़लामी की ज़ंजीरों से आज़ाद कराने के हित में थे, वो इस सत्य से भलीभांति अवगत थे कि हिंदूओं और मुसलमानों को एक साथ लाए बिना यह सपना पूरा नहीं हो सकता था, उन्होंने यह भी कहा कि बाद में जब शैख़ुल हिंद मालटा की जेल से रिहा हो कर बाहर आए तो उन्होंने ज़ोर देकर यह बात कही कि देश की आज़ादी का मिशन केवल मुसलमानों के प्रयासों से पूरा नहीं हो सकता, बल्कि अगर अंग्रेज़ों के चंगुल से देश को छुड़ाना है तो आज़ादी के आंदोलन को हिंदू मुस्लिम आंदोलन बनाना चाहिए, उन्होंने यह भी फ़रमाया था कि अगर सिखों की लड़ाका क़ौम भी साथ आजाए तो देश की आज़ादी का रास्ता और भी आसान हो जाएगा, शैख़ुल हिंद का यह कथन पुस्तकों में सुरक्षित है।

उन्होंने कहा कि हमारे बड़े हिंदू मुस्लिम एकता के रास्ते पर आगे बढ़े और देश को अंग्रेज़ों की गु़लामी से आज़ाद कराया, दुर्भाग्य यह हुआ कि देश आज़ाद हो गया और विभाजन भी हो गया और यह विभाजन तबाही और बर्बादी का कारण बन गया और यह किसी एक विशेष समुदाय के लिए नहीं बल्कि हिंदूओं और मुसलमानों सब के लिए। मौलाना मदनी ने कहा कि अगर विभाजन ना हुआ होता और यह तीनों देश संयुक्त होते तो आज यह स्थिति कदापि ऐसी ना हुई होती कि चीन हमारे सर पर खड़ा हुआ है और भारत के अंदर घुसपेठ कर रहा है और सरकार ख़ामोश है, उन्होंने कहा कि अगर यह ताक़त एक होती तो आज भारत रूस और चीन के हमपल्ला होता और दुनिया की कोई ताक़त हमारी ओर आँख उठाकर देखने का साहस नहीं कर सकती।

उन्होंने आगे कहा कि यह कोई क़िस्सा कहानी नहीं है, एक इतिहास है कि देश की आज़ादी के यह मतवाले हिंदू मुस्लिम का भेदभाव ना करते हुए मानवता के आधार पर सबको एक साथ लेकर चले और अपने उद्देश्य में सफल हुए। उन्होंने इस बात पर बहुत दुख प्रकट किया कि जिस क़ौम ने सबसे पहले वतन की आज़ादी का नारा दिया आज उसी क़ौम को देशद्रोही कहा जाता है, पूरे देश में मुसलमानों की यह तस्वीर बना दी गई है, उन्होंने सवाल किया कि जिनके बड़ों ने देश की आज़ादी के लिए सबसे अधिक बलिदान दिया आज उनकी औलाद देशद्रोही कैसे हो सकती है।

उन्होंने स्पष्टता से कहा कि जो लोग मुहब्बत की जगह नफ़रत की राजनीति करते हैं वही लोग इतिहास को बिगाड़कर प्रस्तुत कर रहे हैं, यह वो लोग हैं जो देश को शांति, एकता अमन और मानवता के आधार पर नहीं नफ़रत के आधार पर चलाना चाहते हैं, गरीबी, अफ़रातफ़री, अशांति, बेरोज़गारी यह बता रही है कि जिस प्रकार की राजनीति को उन्होंने अपनाया है वो देश को बर्बादी और तबाही की ओर ले जाने वाली है, उन्होंने किसी लागलपेट के बगैर कहा कि यह देश हमारा है इसलिए अगर कहीं कुछ होता है तो सबसे अधिक हमारा दिल तड़पता है और इसका कारण यह है कि इस देश के लिए सबसे अधिक बलिदान हमारे बड़ों ने दिया हैं, हम यह बातें डंके की चोट पर कहते हैं, क्योंकि यह मूल इतिहास है। यहां सरकार के कारिंदे भी बैठे हुए हैं, वो एक एक शब्द को सुनें, परखें और पढ़ें कि इतिहास क्या है।

मौलाना मदनी ने कहा कि हम उस परिवार से संबंध रखते हैं जिसके लोगों ने देश की आज़ादी के लिए क़दम क़दम पर यातनाएं झेलीं, यहां तक कि जेल की सज़ाएं भी काटीं, आज जो लोग हमारे देश-प्रेम पर सवाल उठाते हैं वह बताएं कि उनके लोगों ने देश की आज़ादी के लिए क्या किया? तुम्हारी माओं ने तो तुम्हें उस समय जन्म भी नहीं दिया था, तुम्हें क्या पता आज़ादी क्या होती है, तुमने तो केवल नफ़रत ही की है, बलिदान तो हमने दिया है, हमने जेलें काटी हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि यह देश-प्रेम थोड़ा ही है कि लाख दो लाख तिरंगा बांट दो और हीरो बन जाओ कल्कि मूल प्रश्न यह है कि देश की आज़ादी के लिए आपने क्या पापड़ बेले हैं, हमने पापड़ बेले हैं, इसलिए हम जानते हैं कि आज़ादी किसे कहते हैं, हम यह भी बता देना चाहते हैं कि दारुल उलूम देवबंद की स्थापना ही देश की आज़ादी के लिए हुई थी, आज कोई सांप्रदायिक व्यक्ति अगर इसकी तरफ़ उंगली उठाता है तो वह पागल है, मंदबुद्धी है, दीवाना है, वह यह जानता ही नहीं कि दारुल उलूम देवबंद की दीवारों से देश की आज़ादी के लिए कैसी कैसी आवाज़ें उठी हैं, उन्होंने अंत में कहा कि जिस तरह आपको अधिकार है कि देश की आज़ादी के हवाले से आप अपने सूरमाओं का उल्लेख करें हमें भी यह अधिकार प्राप्त है कि हम अपने उन सूरमाओं का उल्लेख करें जिन्होंने मातृभूमि की आज़ादी के लिए अपनी ज़िंदगी की परवाह नहीं की और हंसते हंसते फांसियों पर झूल गए।

 

Leave a Reply