बाहर जोरदार लड़ते राहुल पार्टी के अंदर कमजोर हो जाते हैं

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शकील अख्तर

फिलहाल हम देश की बात करके किसी विवाद में पड़ना नहीं चाहते, मगर कांग्रेस में इससे पहले कौन नेता इस तरह डटा है? समस्या इन दिनों कांग्रेस की ही है इसलिए जवाब कांग्रेसियों को ही देना चाहिए कि उन्होंने राहुल से पहले अपने किस नेता को इस तरह उसूल के लिए, दलित बच्ची को न्याय दिलाने के लिए अड़ते हुए देखा? ट्वीटर जिस पर सरकार का वरद हस्त था को आखिर राहुल गांधी और उनके साथ बाकी कांग्रेस के नेताओं और ईकाइयों के ट्वीटर पर लगाए बैन को हटाना पड़ा। और इसमें खास बात यह कि दिल्ली नांगल की जिस 9 साल की दलित बच्ची और उसके डरे हुए परिवार के समर्थन में जो ट्वीट राहुल ने किए थे उन्हें हटाने से इनकार करने के बावजूद।

नेता ऐसा ही होता है। जो अपने उसूलों के लिए अड़ जाए। कांग्रेसियों को अगर इस समय इन्दिरा गांधी याद आ रहीं हैं तो ठीक याद आ रही हैं। मगर कांग्रेसियों को यह बात समझना चाहिए की उस समय जब इन्दिरा गांधी ने अपने साहस का सबसे पहली बार प्रदर्शन किया था तो वे प्रधानमंत्री थीं। राहुल विपक्ष में और बिना किसी पद पर रहते हुए यह कर रहे हैं। यहां फिर कह दें कि तुलना का कोई सवाल नहीं बस कांग्रेसियों को यह बताना है कि उनका साथ नहीं देने और जी 23 जैसी खुले विरोध के बावजूद राहुल अपनी राह पर बेखौफ चले जा रहे हैं। ऐसा नेता किसी भी पार्टी के लिए सौभाग्य की बात होता है। मगर भारत में सबसे चालाक जमात जो कांग्रेसियों की है वह इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। पहली बार कांग्रेसियों को ऐसा लग रहा है कि कोई उनकी सारी कलाकारियों के बाद भी उन्हें दूर रख सकता है। कलाकारियों को योग्यता और ताकत मानने से इनकार कर सकता है।

कांग्रेस के नेता शीर्ष पर ऐसा लीडर चाहते हैं जो उन पर निर्भर हो। राजीव गांधी और उनके बाद 22- 23 साल तक सोनिया गांधी ने भी कांग्रेस के कुछ नेताओं पर जरूरत से ज्यादा भरोसा किया। और नतीजा सबको मालूम है कि राजीव के साथ विश्वासघात करने से लेकर सोनिया तक को जबर्दस्ती दोबारा अध्यक्ष बनाने और फिर उनकी बीमारी, अस्पताल में भर्ती होने के समय ही गुट बनाकर उन्हें पत्र लिखने और जवाब मांगने वाले भी वहीं लोग थे जिन्होंने सोनिया से सबसे ज्यादा फायदा उठाया। सबको मालूम है कि उस समय सोनिया तो क्या परिवार का कोई सदस्य अध्यक्ष बनना नहीं चाहता था। कांग्रेस के नेताओं ने परिवार के बाहर का अध्यक्ष बनाने की पूरी कोशिश की। अध्यक्ष चुनने के लिए एक प्रक्रिया चलाई। मगर जितने जोगी उतने मठ की तर्ज वह तो एक बड़ा अध्यक्ष मंडल बनने लगा। हारकर अंतिम क्षणों में सब सोनिया के पास गए और उन्हें कांग्रेस का वास्ता देकर मनाया। मगर उन्हीं लोगों ने एक साल के अंदर उनके खिलाफ साजिशें शुरु कर दीं। पत्र पर हस्ताक्षर तो 23 लोगों के थे, मगर इसके पीछे और भी बड़े नेता थे। कभी वे नाम भी सामने आएंगे और इन 23 में से ही कोई बताएगा कि उसने किस के कहने से दस्तखत किए। और एक की आत्मा जागने के बाद कई लोगों की आत्माएं जागने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।


अभी कपिल सिब्बल के यहां जी 23 वाले कांग्रेस के नेता और दूसरे विपक्ष के नेता इकट्ठा हुए। वकील साहब का बर्थ डे मनाया गया। बर्थ डे मनाने में कोई बुराई नहीं। राहुल, सोनिया, प्रियंका कोई नहीं थे इसमें भी कोई बुराई नहीं। बुराई सिर्फ वहां है जहां उस गांधी नेहरू परिवार की आलोचना सुनकर भी उन नेताओं ने कुछ नहीं कहा जिन्होंने परिवार की वजह से ही राजनीति में सब कुछ पाया है। दस साल यूपीए के शासन में मंत्री रहने, संगठन में महत्वपूर्ण पदों पर रहने, भरपूर मान सम्मान पाने वाले इन लोगों को लगता है कि यह सब उनका अधिकार था। इनमें से ही एक जितिन प्रसाद अभी दो महीने पहले भाजपा में चले गए। जाने के बाद से उनका किसी ने नाम सुना हो तो जरा बता दे। उत्तर प्रदेश में चुनाव है। हर छोटे बड़े नेता की पूछ हो रही है। लेकिन कांग्रेस में राहुल और प्रियंका से बराबरी से बात करने वाले जितिन को वहां कोई नहीं पूछ रहा।
राहुल ने उसके बाद एक कार्यक्रम में मैसेज तो दिया कि जो डर रहे हैं वे चले जाएं। कांग्रेस में संघ के लोगों और डरने वालों की कोई जरूरत नहीं है। मगर यह संदेश उतने जोरदार तरीके से नहीं दिया गया जितना दिया जाना चाहिए था। अभी राहुल का ट्वीटर बंद करने के बाद भी कांग्रेस के कई नेताओं ने इसके विरोध में कोई आवाज नहीं उठाई। यहां तक कि दलित बच्ची की मां जिसके उपर भारी दबाव है, ने भी राहुल का समर्थन किया। मगर कांग्रेस के नेता चुप बने रहे। राजनीतिक संघर्ष के ऐसे समय में चुप रहना दूसरे पक्ष का मौन समर्थन ही माना जाता है।

जहां एक और पूरी सरकार, भाजपा, मीडिया इस मामले में राहुल के खिलाफ खड़ी हो गई हो वहां इस दलित बच्ची की मां को सलाम करने को दिल चाहता है जिसने साफ कहा कि उन्हें अपने फोटो सार्वजनिक करने से कोई एतराज नहीं है। लेकिन ऐसी स्थिति में भी कांग्रेस के नेता पीड़ित दलित परिवार से मिलने जाने की बात तो दूर सहानुभूति के दो शब्द भी नहीं कह पाए। राहुल विपक्ष में हैं तब तो पीड़ित परिवार के साथ हैं हीं। जब उनकी पार्टी सत्ता में थी तब भी निर्भया और उसके परिवार के साथ खड़े थे। राहुल ने कभी नहीं बताया वह तो बाद में निर्भया के परिवार ने ही बताया कि कैसे राहुल ने चुपचाप परिवार की सहायता की। और निर्भया के भाई को पायलट बनने में मदद की।

राहुल एक आशा के दीप हैं। मानवीय संवेदनाओं से भरे हुए। हालांकि उनकी जरूरत से ज्यादा उदारता कांग्रेस के उन लोगों के लिए समस्या बनती है जो फैसले चाहते हैं। राहुल एक तरफ सच के लिए कोई भी लड़ाई लड़ने को तैयार हो जाते हैं, तो वहीं पार्टी में वे समर्पित लोग और बाधाएं पहुंचा रहे लोगों के बीच स्पष्ट विभाजन करते नहीं दिखते। जहां वे मजबूत मोदी सरकार और भाजपा से लड़ने में कोई हिचक नहीं दिखाते वहीं पार्टी के अंदर कड़े फैसले लेने में वे हिचक जाते हैं।

कांग्रेस आज जितनी कमजोर है उतनी कभी नहीं थी। इससे ज्यादा कमजोर और क्या होगी! कठोर फैसले लेने के लिए इससे अच्छा समय और क्या होगा। नए लोगों को मौका मिलेगा और एक संदेश जाएगा कि पार्टी में विभीषण बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे।

स्वतंत्रता दिवस पर कांग्रेस मुख्यालय में राहुल ने जी 23 के असंतुष्ट नेताओं की बात खूब ध्यान पूर्वक सुनी। जब से इन्होंने पत्र लिखा है तब से कई बार राहुल और सोनिया इनसे बात कर चुके हैं। पार्टी की कई कमेटियों में इन्हें रखा। मगर इनके विद्रोही तेवर कम नहीं हुए। एक गुट बनाकर मीटिगें करना जारी है। इनमें से एक जो अभी हाल ही में चर्चा में है वह सिब्बल की बर्थ डे पार्टी है। वह भी इसलिए सामने आ गई कि उसमें विपक्ष के और कई नेताओं को भी बुलाया गया था।

पार्टी के वफादार लोगों के लिए यह घटनाएं मनोबल तोड़ने वाली होती हैं। उन्हें लगता है कि यहां धमकी देकर कोई भी काम करवाया जा सकता है। राहुल जब तक यह नहीं समझेंगे कि बाहर लड़ने के लिए अंदर मजबूती बहुत जरूरी है तब तक उनकी लड़ाई चाहे देखने में कितनी ही जोरदार लगे, यथार्थ में नतीजे नहीं ला पाएगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एंव राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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