विशेष रिपोर्ट

रेलवे एयरपोर्ट के बाद अब मोदी सरकार ने कोयला खदानों को देशी विदेशी पूंजीपतियों को आगे गिरवी रखा…

गिरीश मालवीय

रेलवे एयरपोर्ट के बाद कल मोदी सरकार ने देश की कोयला खदानों को देशी विदेशी पूंजीपतियों को आगे गिरवी रख दिया है, कल कोयला सेक्टर में अब सरकार कमर्शियल माइनिंग की इजाजत दे गयी है कोयला खनन में सरकार का एकाधिकार खत्म कर दिया गया है. साथ ही कोयला क्षेत्र में आधारभूत ढांचे के लिए 50 हजार करोड़ का खर्च भी किया जाएगा, शुरुआत में 50 कोल ब्लॉक को कमर्शल माइनिंग के लिए शुरू किया जा रहा है.

सरकार द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के कोयला उद्योग का एकाधिकार ख़त्म करके निजी कंपनियों को कोयला खनन और मार्केटिंग का अधिकार मिलते ही भारतीय कोयले के कारोबार को ललचायी नज़रों से देखने वाले देश-विदेश के पूंजीपतियों की मुरादें अंतत: पूरी हो गईं हैं। कोल इंडिया के मजदूरों के बुरे दिन ओर उद्योगपतियों के अच्छे दिन आ गए है.

सत्तर के दशक में कोयले की खदानों का राष्ट्रीयकरण करने के बाद 1973 में कोल इंडिया की स्थापना की गई थी। राष्ट्रीयकरण से पहले कोयले का खनन निजी हाथों में था। उस समय मजूदरों के शोषण और अवैज्ञानिक खनन ने सरकार को चिंतित कर दिया था। कोयला खदानों में दुर्घटनाएं भी आम बात हुआ करती थीं, पिछले साल मेघालय में निजी कोयला खदान में हुई दुर्घटना आपको याद ही होगी. दरअसल कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण का मुख्य उद्देश्य ही अपव्ययी, चयनात्मक और विध्वंसक खनन को रोकने के अलावा कोयला संसाधनों का सुनियोजित विकास और सुरक्षा मानकों में सुधार करना था।

लेकिन इस सरकार के आते ही तेजी से देश के हर महत्वपूर्ण उद्योग का प्राइवेटाइजेशन शुरू हो गया मार्च 2015 को संसद ने कोयला खनन (विशेष प्रावधान) विधेयक पास किया इस विधेयक में निजी क्षेत्र द्वारा व्यवसायिक खनन का प्रावधान था। इसी विधेयक ने कोल इंडिया का एकाधिकार खत्म करने और खनन में निजी भागीदारी सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाई। ओर आज बची खुची सभी बाधाओं को समाप्त कर दिया गया.

अडानी ओर वेदांता रिसोर्सेज के अलावा बीएचपी, रियो टिंटो और ग्लेनकोर से लेकर एग्लो अमेरिकन जैसी नामचीन बहुराष्ट्रीय खनन कंपनियां भारतीय कोयला खानों पर अधिकार जमाने को तैयार है और भारत की महारत्न कम्पनी कोल इंडिया अपनी आखिरी साँसे गिनने जा रही है. कोयला खदान के उदारीकरण के बाद विदेशी खनन फर्में आती हैं तो ज्यादा संभावना है कि खननकर्ता इसमें मशीनों का इस्तेमाल बढ़ाएंगे और इस क्षेत्र में संभवत: नौकरियों का सृजन नहीं होगा, जबकि उत्पादन में वृद्धि हो सकती है।

यह याद रखने योग्य है कुछ ही समय बाद मोदी सरकार 400 रुपये प्रति टन लगने वाले कार्बन टैक्स को हटाने को तैयार हो जाएगी. कोयला उद्योग का यह निजीकरण को बहुत शातिराना तरीके से अंजाम दिया गया है कोल इंडिया लिमिटेड ने “कोल विजन– 2030” जारी किया था। उसमें कहा गया था कि मौजूदा व्यवस्था में साल 2020 तक देश में 90-10 करोड़ टन और साल 2030 तक 19 करोड़ टन तक कोयले का उत्पादन होगा। इस अवधि में कोयले की मांग साढ़े 11 करोड़ टन से लेकर साढ़े 17 करोड़ टन तक रहेगी। आंकड़ों से स्पष्ट है कि कोयला उद्योग में निजी भागीदारी के बिना ही देश की जरूरतें पूरी होती रहती. लेकिन जानबूझकर ऊंचे लक्ष्य निर्धारित किये गए ताकि यह दिखाया जाए कि कोल इंडिया सही तरीके से काम नही कर रहा है ओर कोयला उद्योग के निजीकरण की जरूरत है.

मोदी सरकार देश को ‘आत्मनिर्भर’ नही बल्कि देशी विदेशी पूंजीपतियों पर निर्भर बनाना चाहती हैं. जैसे रन फ़िल्म में कॉमेडियन विजय राज को गंगा गंगा बोलकर नाले में कुदा दिया जाता है वैसे ही मोदी जी ‘आत्मनिर्भर’ बनाने का बोलकर देश को बेच रहे हैं और भक्त ताली बजा रहे हैं. इससे बड़ा क्या दुर्भाग्य हो सकता है इस देश का?

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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