गोदी मीडिया की रिपोर्टिंग का एक नमूना, जिसने यह नहीं बताया कि मुख्यमंत्री कैमरे की पूजा कर रहे हैं या नहीं

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संजय कुमार सिंह  

गोदी मीडिया ये नहीं बता रहा है कि मुख्यमंत्री कैमरे की पूजा कर रहे हैं या नहीं। ये कह रहा है कि विरोधी जम कर मजे ले रहे हैं। मुख्य खबर गोल कर विरोधी मजे ले रहे हैं – जैसा आदर्श। विरोधी मजे क्यों न लें और ले रहे हैं तो इसमें खबर क्या है? खबर कह रही है कि असल में वे क्या कर रहे हैं वही बता सकते हैं। वीडियो के मामले में ऐसा बहुत कम होता है कि जो दिख रहा है वह नहीं हो। उदाहरण के लिए मूर्ति के सामने कोई और मूर्ति हो सकती है। और उसे पीछे घूमकर ही आरती दिखाई जाएगी।

इसी तरह भगवान राम की मूर्ति के सामने कई बार हनुमान जी की मूर्ति होती है और भक्ति राम के साथ हनुमान की भी पूजा करते हैं, कर सकते हैं। इस मामले में क्या है पता नहीं। पर खबर तो जो वास्तविकता है वही होगी। अटकल को खबर क्यों बनाना? आपके पास खबर नहीं है, सच बताने की हिम्मत नहीं है तो घर बैठिए। जबरन भक्ति करने की क्या जरूरत है? वैसे भी, मीडिया का काम है पूछना, पूछकर बताना। कायदे से इस ‘खबर’ का सबसे जरूरी हिस्सा था योगी आदित्य नाथ का पक्ष लेना और उनके पक्ष के बिना इस ‘खबर’ का कोई मतलब नहीं है।

 

लेकिन इतनी हिम्मत मीडिया में कहां बची है? मेरे ख्याल से इतनी हिम्मत न हो तो ऐसी खबर नहीं करनी चाहिए। लेकिन भक्ति के इस जमाने में एक गंभीर मामले को हल्का करने की कोशिश भी है। इसमें मोमबत्ती से आरती करने पर भी कोई टिप्पणी नहीं है। खबर यही है कि ‘बिना जाने लोग मजाक उड़ा रहे हैं’। जबकि मजाक उड़ाने लायक वीडियो है, इसलिए मजाक उड़ा रहे हैं।

यह नहीं बताया जा रहा है कि अगर यह कैमरे की पूजा नहीं है तो क्या है। ऐसा किसी और ने किया होता तो किसी भक्त की धार्मिक आस्था को ठेस पहुंच सकती थी कि भगवान को पीठ दिखा रहे हैं या मूर्ति के रहते कैमरे या फोटोग्राफर की आरती उतार रहे हैं। योगी जी के मामले में कौन बोले और जो बोल रहा है उसे हल्का साबित करना ही आजकल ‘खबर’ होती है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)