इतिहास लेखन और मंदिरों से संबंधित मध्यकालीन भारत के मुस्लिम शासकों की छवि पर एक किताब

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प्रो. मोहम्मद सज्जाद

मुस्लिम शासकों के अधीन,भारत में मंदिरों के विध्वंस के प्रश्‍न पर लंबे समय से ऐतिहासिक मतभेद चला आ रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका के एरिज़ोना विश्वविद्यालय से संबंधित एक प्रसिद्ध इतिहासकार रिचर्ड ईटन ने 2004 में एक पुस्तक प्रकाशित की, जो उनके अक्टूबर 1999 के ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में दिए गए लेक्चर (जो वर्ष 2000 में प्रकाशित हुआ था) का विस्तार रूप है।

रिचर्ड ईटन की दो पुस्तकें बहुत लोकप्रिय हुई। जिनमें से पहली पुस्तक, बीजापुर (दक्कन) के तेरहवीं से सत्रहवीं शताब्दी के सूफियों के, सामाजिक चरित्र पर थी (बाद में तेरहवीं से अठारहवीं शताब्दी तक के दक्कन के सामाजिक इतिहास पर भी एक पुस्तक प्रकाशित हुई)। उनकी दूसरी प्रसिद्ध पुस्तक जिसका विषय–बंगाल में इस्लाम का आगमन और विस्तार (13वीं से 18वीं सदी ई.) था।

कुछ साल पहले, उन्होंने दसवीं शताब्दी से अठारहवीं शताब्दी तक के भारत के इतिहास पर एक उत्कृष्ट और लोकप्रिय पाठ्यपुस्तक भी प्रकाशित की। इस प्रकार के पाठ्यपुस्तक की, स्नातक छात्रों और शिक्षकों को सख्त आवश्यकता थी। ख़ैर, इस लेख में मंदिरों के विध्वंस पर जो विवाद है, उसको यहां हिंदी में संक्षेप में प्रस्तुत किया जा रहा है। [ इस विषय पर ईटन का विस्तार से इंटरव्यू, स्क्रॉल (नवम्बर 20, 2015) और फ्रंटलाइन (दिसम्बर 22, 2000) में प्रकाशित हो चुका है]।

1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद से, यह बहस बहुत तेज हो चली थी। संघ विचारक सीता राम गोयल ने 1990 में एक पुस्तक प्रकाशित की थी, जिसमें कहा गया था कि मुस्लिम शासकों द्वारा 80,000 से अधिक मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया था। जबके ईटन ने अपने शोध में पाया कि 80 मंदिरों को तोड़ा गया था, और इन संख्याओं के इतर, मध्य युग के मंदिरों को ध्वस्त करने और पुनर्निर्माण करने और इन मंदिरों को सरकारी संरक्षण दिए जाने की राजनीति पर, सारगर्भित चर्चा की गई है।

औपनिवेशिक काल में, हेनरी इलियट ने, जॉन डॉसन की मदद से 1849 में ‘हिस्ट्री ऑफ इंडिया इज टोल्ड बाय इट्स ओन हिस्टोरियंस’ का आठ खंडों में, आधिकारिक तौर पर अनुवाद करवा कर प्रकाशित किया। उन लोगों ने मुस्लिम शासकों की तुलना में, औपनिवेशिक काल को बेहतर और न्यायपूर्ण दिखाने की खातिर पूर्व औपनिवेशिक काल, अर्थात् भारत में मुस्लिम शासकों के युग को हिंदू विरोधी के रूप में चित्रित करने के लिए, अतिरंजित कहानियों को गढ़ना शुरू कर दिया, और इस प्रकार, हिंदू और मुसलमान दोनों के बीच नफरत फैलाना शुरू कर दिया।

मौलवी ज़काउल्लाह  (1832-1910) ने अपनी पुस्तक ‘ तारीख़-ए- हिंदुस्तान’ में, अंग्रेजों के इस साम्प्रदायिक इतिहास-लेखन का पर्दाफाश किया था। प्रो. इक़तदार आलम खान (1991) ने, अलीगढ़ आंदोलन और इतिहासलेखन का जिक्र करते हुए कहा था, “भारतीय इतिहास की सांप्रदायिक व्याख्या केवल अंग्रेजी शिक्षा में शामिल पाठ्यपुस्तकों की देन है”।

प्रोफेसर मुहम्मद हबीब (1895-1971) ने इलियट और डाउसन  के लेख की आलोचना करते हुए एक लंबा शोध प्रत्र प्रकाशित किया। बहुत बाद में दारुल मुसन्निफ़ीन शिबली अकादमी, आज़मगढ़ नें, इतिहासकारों की एक कमिटी बनाई थी जिसका उद्देश्य एक ऐसा इतिहास लिखना था, जो घृणित इतिहासलेखन के ज़हर को मारक प्रदान कर सके। हालांकि, वह काम अच्छी तरह से नहीं किया जा सका, लेकिन सैयद सबाहुद्दीन अब्दुर्रहमान (1911–1987) ने  मध्ययुगीन भारत के इतिहास के सम्बंध में, उन्होंने, “बज़्म सीरीज़” के अंतर्गत किताबें लिखने का एक बड़ा काम किया, इन किताबों में से एक किताब (1958) जो मध्ययुगीन शासकों की धार्मिक सहिष्णुता से संबंधित है, के लिए एक छोटी लेकिन व्यापक प्रस्तावना, निवर्तमान विदेश मंत्री एवं बिहार के भूतपूर्व शिक्षा मंत्री,  डॉ० सैयद महमूद (1889-1971) ने, उत्कृष्ट उर्दू गद्य में लिखा है।

रिचर्ड ईटन ने, अपने इस लेख के शुरू में ही एक विशेष उदाहरण से यह बताने की कोशिश की है कि, भगवाई लेखक, सीता राम गोयल, और उन जैसे दूसरे घृणित इतिहासलेखन करनेवालों ने, अपने तर्क के लिए जिस फारसी स्रोत पर भरोसा किया है, वह स्रोत खुद ही बेहद संदिग्ध हैं। दाहरण के लिए, मालवा (मध्य प्रदेश) राज्य की राजधानी ‘धार’ के एक मंदिर में 1455 का एक फारसी शिलालेख है, जिसमें परमार वंश के राजा भोज (1010–1053)  के समय में किसी अब्दुल्लाह शाह चांगल  के द्वारा तोड़े गए मंदिर और राजा भोज के मुस्लिम होने का उल्लेख है। अब्दुल्लाह शाह चांगल के दरगाह का भी उल्लेख है। इन शिलालेखों के दावों के सावधानीपूर्वक अध्ययन से पता चलता है कि राजा भोज से पहले भी वहां कुछ मुसलमान थे, यह किसी भी तरह से साबित नहीं होता है। दूसरा युग अब्दुल्लाह चांगल का है, जो कथित तौर पर मक्का से आए थे, वह भी किसी तरह से साबित नहीं होता है। और तीसरा युग महमूद खिलजी का है, जिन्होंने चांगल के दरगाह का पुनर्निर्माण किया था।

यह शिलालेख, इस विशेष घटना के चार शताब्दी के बाद, अर्थात् 1455 का है। इस शिलालेख में, राजनीतिक प्रकृति के मुद्दों जैसे धर्मांतरण, शहादत, सूफी दरगाहों के राजकीय संरक्षण आदि पर ध्यानपूर्वक विचार किया जाना चाहिए। अतः नई और मनगढ़ंत इतिहास-लेखन की इस राजनीति को समझते हुए मुस्लिम शासकों द्वारा लिखवाए गए ग्रंथों को बहुत ध्यानपूर्वक और सावधानी से देखने समझने की ज़रूरत है।

सन् 986 के बाद सुल्तान सुबकतगिन ने, काबुल और पंजाब के बीच हिंदू शाही शासकों के अधिकांश क्षेत्रों में, काफी लूटपाट और तबाही मचाई थी। सुबकतगिन के सलाहकार और मंत्री, अबू नस्र उतबी ने भी इस बात को स्वीकार किया है। राजनीतिक विजय से धर्मांतरण की यह राजनीति, और धर्मांतरण के बयान से राजनीतिक जीत की पुष्टि पर, इस्लामी मुहर लगाने की यह राजनीति भी बहुत ख़ूब है, जो उतबी के बाद के लेखन में बहुत अच्छी तरह से मिलती है। सुबकतगिन के पुत्र महमूद गज़नवी ने भौतिक रूप से समृद्ध मंदिरों की संपत्ति को लूटना और काबुल ले जाना जारी रखा। ईरान और उत्तर भारत के लूट के माल के कारण ही, गजनवी सेना मजबूत होती रहीं। सल्जुकी और गौरियों ने, गज़नवीयों को, मध्य एशिया से मिलने वाले युद्ध सामग्री की  आपूर्ति ही बंद कर दी।

पूर्वी ईरान के ताजिक शासकों की शाख, गौरियों, और उनके  गुलाम तुर्कों की हुकूमत (दिल्ली साम्राज्य,1206-1526) ने उत्तर भारत की राजनीति में एक नई परम्परा की शुरुआत की, जो आक्रामनकारी तो नही रहे, बल्कि औपचारिक रूप से स्थापित हुए। उन शासकों ने, सूफी और सीमित स्तर पर और सावधानी से मंदिरों को तोड़ने की एक नई सियासत शुरू कर दी।

सन् 1350 में, बहमनी साम्राज्य के शाही कवि, अब्दुल मलिक ईसामी, ने राज्यों की शक्ति के पीछे सूफियों की दैवीय शक्ति को बहुत महत्व देते हुए कहा कि अजमेर के सूफी हज़रत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती (मृत्यु 1236) ने दिल्ली सल्तनत की, मंगोलों से रक्षा की। और तुग़लक़ के पतन का कारण यह था कि हजरत निजामुद्दीन का निधन वर्ष 1325 ई. में हुआ था। इसके अलावा, दक्कन में बहमनी साम्राज्य के उदय का कारण, हज़रत बुरहानुद्दीन ग़रीब (मृत्यु 1337) और हज़रत ज़ैनुद्दीन शिराज़ी (मृत्यु 1369) हैं। और बंगाल में एलियास शाही शासन के उदय का श्रेय, शेख अली उल हक (1398) के आध्यात्मिक शक्ति को दिया। प्रांतीय शक्तियां भी, उदाहरण के लिए, गुजरात में मुज़फ्फर ख़ां का उदय भी अजमेर में; दिलावर खान का मालवा में, और स्वयं फिरोज शाह तुग़लक़ के उदय के लिए, नसीर-उद-दीन महमूद चिराग़ दिल्ली को जिम्मेदार ठहराया गया।

साम्राज्य निर्माण की प्रक्रिया में, खास या चुनिंदा मंदिरों को तोड़ने की राजनीति भी कुछ इस प्रकार है। पराजित राजा के राष्ट्रीय देवता वाले मंदिर को, विशेष रूप से निशाना बनाया जाता था। अन्य मंदिरों, जिनका कोई राजनीतिक महत्व नहीं था, उन आम मंदिरों को, निशाना नहीं बनाया जाता था। उदाहरण के लिए, 13वीं शताब्दी से पूर्व, खजुराहो के मंदिरों से चंदेल शासकों का  लगाव नहीं था, इसलिए उन्हें निशाना नहीं बनाया गया। इस प्रकार, “मूर्तियों को तोड़ने के धर्मशास्त्र” की परिकल्पना को सामान्यीकृत नहीं किया जा सकता है। हालांकि फ़ारसी स्रोतों में मूर्तिपूजा की कड़ी निंदा की गई है।

यहां यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि, छठी शताब्दी ई. से ही,  मंदिर, देवता, ज़मीन और राजा के बीच संबंध स्थापित हो चुका था, और तब से, इस तरह के राजनीतिक महत्व के मंदिरों को लक्षित किया जाने लगा था। यह मुस्लिम शासकों से पहले भी होता चला आ रहा था। उदाहरण के लिए, वर्ष 642 में, पल्लव शासक नरसिंह वर्मन प्रथम ने चालुक्य की राजधानी, वातापी, से भगवान गणेश की मूर्ति को लूट लिया था। वर्ष 692 में, चालुक्य शासकों ने उत्तर भारत के अभियान में गंगा और जमुना की मूर्तियों को भी ले गए थे। 8वीं शताब्दी ई. में, बंगाल सेना ने बदला लेने के लिए, कश्मीर के शासक ललितादित्य के शाही देवता, विष्णु वेकंठ, की मूर्ति को ध्वस्त कर दिया था। 9वीं शताब्दी ई. में राष्ट्रकुट के शासक गोविंद तृतीय, ने कांचीपुरम और श्रीलंका में भी ऐसा ही किया। 10वीं शताब्दी की शुरुआत में, प्रतिहार शासक ने कांगड़ा में, विजित राजा के मंदिर और राजा देवता के साथ भी ऐसा ही किया। रिचर्ड ईटन ने ऐसे कई उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। रिचर्ड एच डेविस की किताब (1997), ‘लाइव्स ऑफ इंडियन इमेजेज’ में ऐसी कई विस्तारपूर्वक विवरण सूचीबद्ध हैं।

मुगल शासकों के यहां ऐसे उदाहरण विरले ही मिलते हैं, शायद इसलिए कि मुगलों ने, राज्य को लोधी अफगान शासकों से प्राप्त किया था, न के किसी हिंदू शासक से। इसलिए, राजनीतिक सत्ता स्थापित करने और क़ायम रखने के लिए इस तरह के कदम की कोई आवश्यकता नहीं थी। जबके 1661 में, मुगल गवर्नर, मीर जुमला, ने कूच बिहार के राजा से जुड़े मंदिरों को ध्वस्त कर दिया। और 1662 में, ब्रह्मपुत्र के अहोम शासकों के मंदिरों को भी क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। अर्थात्, छठी शताब्दी ई. से ही, विजित राजा के देवता को क़ब्जे में लेना एक आवश्यक राजनीतिक प्रक्रिया बन चुका था।

मंदिरों की सुरक्षा भी साम्राज्य की नींव और सत्ता को मजबूत रखने का एक उपकरण था। अतः मुहम्मद तुग़लक़ ने 1326 में कल्याण (बिदर) के शिव मंदिर का निर्माण और विस्तार किया। 14वीं शताब्दी के कश्मीर के शासक सुल्तान शहाबुद्दीन ने अपने ब्राह्मण मंत्री को डांट कर चुप करा दिया जब उन्होंने, उन्हें, मूर्तियों को पिघलाने और उससे नकद रूपया प्राप्त करने की सलाह दी। सिकंदर लोदी को, उनके मुफ्तियों ने सलाह दि थी कि मंदिरों और मूर्तियों को किसी भी तरह से नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए। अकबर के मंत्री, अबुल फ़ज़ल अल्लामी, ने भी महमूद ग़ज़नवी के सलाहकारों की कड़ी निंदा करते हुए यह कहा कि मंदिरों को गिराने की नीति बिल्कुल अस्वीकार्य है।

रिचर्ड ईटन हमें बताते हैं कि अकबर के समय से लेकर 1735 ई. तक, मुगल शासकों ने अपने साम्राज्य के भीतर के मंदिरों (भवनों, मूर्तियों, पुजारियों, भूमि आदि सहित) को साम्राज्य की  विशेष संपत्ति के रूप में माना और उनकी रक्षा और विकास का काम किया। इसे शासक और उसके अधीन लोगों के बीच मधुर संबंध बनाए रखने के लिए एक उपकरण के रूप में देख गया। अकबर ने अपने वरिष्ठ हिंदू अधिकारियों को भी मंदिर के निर्माण और पुनर्निर्माण के लिए भी राजी किया। शाहजहाँ के मनसबदार को जगन्नाथ मंदिर का मुखिया बनाकर, राजा ने, खुद को भगवान जगन्नाथ के प्रतिनिधि और इस मंदिर के मुखिया के रूप में जाना। (मुहम्मद तुगलक ने भी ऐसा ही किया था)। वैसे भी, मुगलों का राजनीति तरीका, ये था कि मौजूदा राजनीतिक सत्ता को खत्म करने के बजाय उसे मुगल प्रशासन में एकीकृत करना था। यानी तख्त-ए-ताऊस और भगवान जगन्नाथ के बीच एक रणनीतिक राजनीतिक संबंध स्थापित हो सके। यहां तक कि औरंगजेब जैसे शासक द्वारा 1659 में, बनारस के अधिकारियों को दिया गया निर्देश भी ऐसी ही नीति का संकेत है। इसमें यह भी कहा गया है कि मंदिरों को तोड़ना गैर कानूनी है।

लेकिन इस तरह की मुगल नीति के बावजूद, जिन मंदिरों का, स्थानीय राजा या अधिकारी से सीधा संबंध था, या जिन्होंने विद्रोह किया था, या विद्रोह कर सकते थे, वैसे ‘राजनीतिक मंदिरों’ पर हमला किए जाने का खतरा बढ़ जाता था। उदाहरण के लिए, जब शिवाजी भोंसले ने 1659 में, उत्तरी कोंकण तट के  बंदरगाह पर कब्जा कर लिया, तो मुग़लों के बीजापुर के  अधिकारी, अफजाल खां, ने शिवाजी से जुड़ी भवानी देवी के तेलजापुर मंदिर पर हमला कर दिया। 1613 में, जहांगीर ने भी राजा अमर प्रताप से  से संबंधित पुष्कर (अजमेर के पास) के मंदिर पर हमला कर किया।

सन् 1669 में, बनारस के कुछ जमींदारों ने विद्रोह कर दिया था, और उनमें से कुछ पर संदेह था कि उन्होंने शिवाजी को मुगल कैद से फरार होने में मदद की थी। राजा मान सिंह के प्रपौत्र जय सिंह पर भी ऐसा ही संदेह था। और शायद जय सिंह ने ही बनारस का विश्वनाथ मंदिर बनवाया भी था। यह भी एक राजनीतिक पृष्ठभूमि थी, सितंबर 1669 में विश्वनाथ मंदिर को नुक़सान पहुंचाने के पीछे।

इस विशिष्ट संदर्भ में रिचर्ड ईटन ने अन्य राजनीतिक और प्रशासनिक पृष्ठभूमि का कोई उल्लेख नहीं किया है। इसके लिए पाठकों को ओम प्रकाश प्रसाद (1990) की एक पुस्तिका पढ़नी होगी जो कि खुदा बख्श लाइब्रेरी, पटना, में दिया गया उनका व्याख्यान है। सन्  1670 के शुरू में मथुरा में  जाटों ने विद्रोह कर दिया था और वहां के एक मस्जिद के इमाम की हत्या कर दी गई थी। इस विद्रोह के नेता को जब पकड़ लिया गया, तो केशव देव मंदिर के एक हिस्से को ध्वस्त कर दिया गया और उसे ईदगाह में बदल दिया गया। 1679 में, राजस्थान में कई मंदिरों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। उसमें जोधपुर का वह मंदिर भी शामिल था जिस क्षेत्र का प्रमुख कभी दारा शिकोह का समर्थक रह चुका था।

इस संबंध में, अप्रैल 1669 के औरंगजेब के, एक फरमान का बहुत गलत अर्थ निकाला गया। इस आदेश की सामान्य व्याख्या यह की गई है कि औरंगजेब ने सभी मंदिरों को तोड़ने का आदेश दिया था, जबकि इस आदेश के पाठ (मासिर–ए–आलमगीरी में वर्णित) का तथ्य, यह निर्देश देता है कि स्थानीय जांच अधिकारी यह सुनिश्चित करें कि मदरसों और मंदिरों में मुस्लिम और हिंदू छात्रों को ऐसी मसलकी शिक्षा (शिक्षण के रूप में) दी जा रही है, जिससे मसलकी (पंथ आधारित) तनाव हो सकती है, उन पर नज़र रखी जाए। इस फ़रमान में, “मदारिस-ए- मुक़र्रर” (पहले से चल रहे विद्यालय) और “तद्रीसे–ए–कुतुब–ए- बातिला” (झुठी पुस्तकों का शिक्षण) और “तालिबान-ए- हिंदू और मुस्लिम”, जैसे शब्दावली प्रयुक्त किए गए हैं। औरंगजेब ने उस मस्जिद के साथ वैसा व्यवहार नहीं किया जहां विद्रोही शेख मुहम्मदी (मृत्यु 1696 ई.) ने शरण ली थी। उसने शेख मोहम्मदी को औरंगाबाद में कैद कर लिया था। रिचर्ड ईटन बताते हैं कि मस्जिद, खानकाह, किसी खास क्षेत्रीय शासकों से जुड़ा हुआ नही माना जाता था, अतः वह मंदिर भी जो सिर्फ आम लोगों से जुड़ा माना जाता था, वह हमेशा राजनीतिक उत्पीड़न से, सुरक्षित रहता था।

इस संबंध में, पाकिस्तान के सांप्रदायिक इतिहासलेखन और भारत के मुसलमानों के भीतर के सांप्रदायिक तत्वों ने भी, मंदिरों के विध्वंस के इतिहास पर गर्व महसूस किया है, जो इस मुद्दे को और अधिक विवादास्पद बनाते हुए, तनाव और नफ़रत के माहौल को बढ़ावा दिया है।

हिन्दी अनुवाद: नूरूज्ज़मा अरशद

 

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