मुजफ्फरनगर दंगों के आठ साल: पीड़ित परिवारों को है न्याय का इंतजार

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मुजफ्फरनगर दंगों को आठ साल बीत गए हैं, लेकिन अभी तक दंगा पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जनपद शामली के कस्बा कांधला के पुनर्वास क्षेत्रों में रहने वाले मुजफ्फरनगर दंगों से प्रभावित सैकड़ों परिवार अभी भी न्याय का इंतजार कर रहे हैं। 70 वर्षीय कौसर बी उन अभागी महिलाओं में शामिल हैं, जिनके पति नसीरुद्दीन कभी घर नहीं लौटे, नसीरुद्दीन 2013 के सितंबर में एक सुबह घर से काम पर गए थे, लेकिन फिर लौटकर नहीं आ। कौसर कहती हैं “मेरे पति का शव कभी नहीं मिला। वह लापता हुए 11 लोगों में शामिल थे। जो अभी भी लापता हैं।”

उनके बेटे आस मोहम्मद ने राज्य सरकार से प्राप्त 15 लाख रुपये के मुआवजे के साथ एक साल पहले परिवार द्वारा बनाए गए मकान की ओर इशारा किया, इस घर का प्लास्टर होना बाकी है उसमें शौचालय भी नहीं है। कौसर के परिवार के सदस्य में कौसर के पांच बेटे, दो बेटियां और पोते – खुले में शौच करते हैं। इन बस्तियों में पीने योग्य पानी के स्रोत बहुत कम हैं। कांधला में तक़रीबन दो हज़ार परिवार ऐसे हैं जो दंगों के बाद यहां चले गए थे।

न्याय न मिलने क सबसे ज्यादा दुःख

अंग्रेज़ी अख़बार ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ कौसर को जिस चीज से उसे ज्यादा दुख है वह है न्याय की कमी। दंगा पीड़ितों को न्याय दिलाने में मदद कर रहे शामली के वकील अकरम अख्तर चौधरी कहते हैं “दंगा प्रभावित परिवार को ढूंढना मुश्किल है जिसने मामले को बंद कर दिया है। हमने आरटीआई लगाई उससे पता चला कि 2013 के दंगों में 510 प्राथमिकी दर्ज की गई थी। इनमें से, फाईनल रिपोर्ट – जहां सबूत के अभाव में मामले बंद हैं – 165 मामलों में दायर किए गए थे। 175 मामलों में चार्जशीट दाखिल की गई, लेकिन हत्या के 19 मामले बंद कर दिए गए। हत्या के प्रयास के 47 मामलों में से 14 को खारिज कर दिया गया और 15 आरोपियों को सबूतों के अभाव में छोड़ दिया गया। लगभग 31 आरोपियों को बरी कर दिया गया.”

हिंसा में अपने पति को खोने वाली उमरी (65) ने कहा कि गिरफ्तारियां की गईं लेकिन आरोपियों को आखिरकार छोड़ दिया गया। उमरी कांधला में अपने जर्जर घर पांच बेटों के साथ रहती है, उसकी बिखरी हुई जिंदगी को एक साथ जोड़ने के लिए निरंतर संघर्ष को याद करती है। उसके आसपास के चार अन्य परिवार हैं जो हिंसा के बाद यहां आकर बस गए थे। वे सभी एक ही नल से पानी लेते हैं। पानी गुणवत्ता की ओर इशारा कर उमरी बताती है कि “हम जो पानी पीते हैं उसका रंग देखिए” दंगा पीड़ितों की इस बस्ती में स्वास्थ्य, स्वच्छता, शिक्षा और दंगा प्रभावित परिवारों का भविष्य एक हताहत बना हुआ है।