देश पर हुए सबसे बड़े आतंकी हमले 26/11 से जुड़े तीन बड़े अनसुलझे रहस्य

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Girish Malviya
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Girish Malviya is Independent journalist & Economist Expert.

अजमल कसाब के मोबाइल का क्या हुआ?

कल खबर आई कि मुंबई पुलिस के एसीपी शमशेर ख़ान पठान ने मुंबई पुलिस के पूर्व आयुक्त परमबीर सिंह पर आरोप लगाया है कि उन्होंने 26/11 हमले के दोषी अजमल कसाब के मोबाइल फ़ोन को ‘नष्ट’ कर दिया था. शमशेर खान पठान इस मामले में 26 सितंबर 2021 को मुंबई पुलिस कमिश्नर को एक पत्र लिखा, शमशेर पठान ने अपनी लिखित शिकायत में कहा है कि डीबी मार्ग पुलिस थाने के तत्कालीन एसआई एन आरमाली ने सूचना दी थी कि उन्हें कसाब से एक मोबाइल मिला है जिसे काम्बले नाम के एक हवलदार को दिया गया था. उन्हें ये मोबाइल 26/11 हमले की जांच करे रहे अधिकारी रमेश महाले को सौंपना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं किया, पठान 2007 से 2011 के बीच पाईधूनी पुलिस स्टेशन में बतौर सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर तैनात थे। उनके बैचमेट एनआर माली बतौर सीनियर इंस्पेक्टर डीबी मार्ग पुलिस स्टेशन में कार्यरत थे। उन्होंने ही इस पूरे मामले की जानकारी उन्हें दी थी , पठान ने आगे बताया कि आतंकी हमले के कुछ दिन बाद मैंने फिर से सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर माली से बात की थी और उन्होंने मुझे बताया कि उन्होंने इस बाबत मुंबई दक्षिण क्षेत्र के आयुक्त वेंकटेशम से मुलाकात कर उनसे परमबीर से वह फोन लेने और उसे संबंधित जांच अधिकारी को जांच के लिए देने को कहा था। पठान ने आगे बताया कि अब मैं रिटायर्ड हो चुका हूं और आजकल समाज सेवा का काम कर रहा हूं। माली भी अब असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर की पोस्ट से रिटायर्ड हो चुके हैं। इस बारे में कुछ दिन पहले मैंने फिर से जब माली से पूछा तो उन्होंने मुझे बताया कि वे इस सबूत की बात करने तत्कालीन ATS चीफ परमबीर सिंह के पास गए थे। उन्होंने परमबीर से इस सबूत को क्राइम ब्रांच को सौंपने को भी कहा था, लेकिन परमबीर उलटे उन पर ही भड़क गए। उन्होंने खुद के सीनियर होने की बात कहते हुए डांट कर माली को अपने ऑफिस से निकाल दिया था। उस दौरान परमबीर ने कहा था कि आपका (माली) इस मामले से कोई लेना देना नहीं है !

मोबाइल फोन इस मामले का सबसे अहम सबूत था। इसी फोन से कसाब पाकिस्तान से निर्देश पा रहा था। यह फोन उसके पाकिस्तान और हिन्दुस्तान में उनके हैंडलर के लिंक को सामने ला सकता था।

हेमन्त करकरे की मौत कैसे हुई?

कामा हॉस्पिटल के सामने रंगभवन लेन में हुई मुठभेड़ और उन 45 मिनट का सच जनता के सामने कभी आया ही नही, मुंबई पुलिस ने भी इस मामले में पूरी तरह से चुप्पी साध रखी है महाराष्ट्र के आईजी रहे एस.एम. मुशरिफ़ ने लिखी है, किताब का नाम है ‘करकरे के हत्यारे कौन ? ‘भारत में आतंकवाद का असली चेहरा’

इस किताब में ऐसे ऐसे खुलासे किए गए हैं जिसको लेकर हंगामा मच जाना चाहिए था, लेकिन इस देश मे हंगामा सलमान खुर्शीद की किताब को लेकर तो मच सकता है लेकिन आईजी एस.एम. मुशरिफ़ की किताब से नही मचता इस किताब में मुंबई क्राइम ब्रांच की मुठभेड़ की कहानी में झोल को साफ साफ इंगित किया गया है

कुछ साल पहले सेवानिवृत्त न्यायाधीश बीजी कोलसे पाटिल ने भी हेमंत करकरे की हत्या के मामले में बड़ा गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे की मौत कसाब की गोली से नहीं बल्कि महाराष्ट्र पुलिस की गोली से हुई है। बीजी कोलसे पाटिल ने कहा कि हेमंत करकरे को महाराष्ट्र पुलिस ने पिस्टल, ‘प्वाइंट नाइन’ के साथ पीठ में गोली मारी थी।

 

आपको याद दिला दू कि हेमन्त करकरे उस वक्त मालेगांव केस की जांच कर रहे थे नीचे लिंक में मुंबई आजतक का वह वीडियो मौजूद है जिसे 26 नवम्बर की सुबह ही शूट किया गया था इस वीडियो में करकरे आजतक संवाददाता को इस केस में कोर्ट में चल रही कार्यवाही का ब्यौरा दे रहे हैं. ठीक उसी रात कामा अस्पताल की छत पर आईपीएस अधिकारी सदानंद दाते के फंस जाने और फिर आतंकवादियों के खिलाफ मोर्चा लेते हुए घायल हो जाने की खबर सुनने के बाद एटीएस चीफ हेमंत करकरे, अडिशनल सीपी अशोक काम्टे के साथ एनकाउंटर स्पेशलिस्ट विजय सालसकर ओर चार कांस्टेबल भी कामा अस्पताल की पीछे वाली गली में पहुंच गए ये सभी एक ही गाड़ी टोयोटा क्वालिस में बैठे हुए थे, कहा जाता है कि रंग भवन के पास झाड़ियों में छिपकर दो आतंकियों ने पुलिस जीप पर फायरिंग की। दोनों तरफ से जोरदार फायरिंग हुई जिसमें हेमंत करकरे, विजय सालस्कर और अशोक काम्टे शहीद हो गए। इसी गाड़ी से इनके शवो को हटा कर फिर आतंकी आगे निकल गए।

सबसे खास बात यह है कि हेमन्त करकरे को बुलेट प्रूफ जैकेट पहने होने के बाद गोली कैसे लगी ? क्या बुलेट प्रूफ जैकेट खराब था। एक ओर थ्योरी यह है कि उन्हें गर्दन पर ऐसी जगह गोली लगी जहां बुलेट प्रूफ जैकेट नहीं था लेकिन ये गोली उस हथियार की नहीं थी जो कसाब के पास बताया जा रहा था. यह बहुत बड़ा झोल था।

हेमन्त करकरे की पत्नी और बेटी ने भ इस बारे में सवाल खड़े किए थे कि उनकी बुलेटप्रूफ जैकेट का क्या हुआ ! उनकी बेटी का बयान है कि मेरे पिता के पोस्टमार्टम के वक्त की लिस्ट में काफी सामान था, लेकिन बुलेटप्रूफ जैकेट गायब थी. मैं भी हैरान थी कि यह कैसे हुआ? जबकि वो बुलेटप्रूफ जैकेट पहन कर ही निकले थे’

अशोक काम्टे कामा हॉस्पिटल कैसे पुहंचे?

अशोक कामटे की पत्नी विनीता ने एक किताब लिखी थी। इस किताब का नाम ‘टू द लास्ट बुलेट’ है, इस किताब में अशोक कामटे की पत्नी विनीता कामटे ने राकेश मारिया पर इल्ज़ाम लगाया है कि उन्होंने उनके पति को कामा अस्पताल भेजने का निर्देश देने से इंकार किया था. राकेश मारिया पुलिस के ऑपरेशन को लीड कर रहे थे।

‘द लास्ट बुलेट’ में विनिता ने सवाल उठाया है कि राकेश मारिया ने इस बात का पता होने से इनकार क्यों कर दिया कि अडिशनल पुलिस कमिश्नर (पूर्व) अशोक काम्टे कामा अस्पताल कैसे गए, विनीता ने इस सिलसिले में तब के पुलिस कमिश्नर हसन गफूर से मुलाकात की, वे अपनी किताब में लिखती हैं। ‘जब मैंने हसन गफूर से मुलाकात की, तो उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं पता कि अशोक कामा अस्पताल कैसे पहुंचे, जबकि उन्होंने खुद उन्हें ट्राइडेंट होटल बुलाया था।

विनीता काम्टे ने सूचना के अधिकार के तहत मुंबई हमले की रात कंट्रोल रूम और उस वैन के बीच हुई वायरलेस बातचीत का पूरा ब्यौरा मांगा था, जिसमें उनके पति के साथ ही एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे और एंकाउंटर स्पेशलिस्ट विजय सालसकर मौजूद थे।

किताब में राकेश मारिया पर यह भी आरोप लगाया गया है कि उन्होंने अशोक कामटे समेत महाराष्ट्र के आतंक-निरोधक स्क्वाड के प्रमुख हेमंत करकरे और एनकाउंटर स्पेशलिस्ट विजय सलास्कर को पर्याप्त सुरक्षा कवर नहीं दिया और वे लोग कामा अस्पताल के पास मारे गए थे. विनीता कामटे की किताब के मुताबिक उनके पति के बार-बार कहे जाने के बाद भी कंट्रोल रूम ने उन्हें रीएनफोर्समेंस (मदद) नहीं भेजी। अगर दी होती तो शायद अशोक कामटे समेत वो तीनों अफसर नहीं मारे जाते जिनकी हत्या आतंकी कसाब और इस्माइल ने रंग भवन के पास की थी।

किताब में लिखा है कि 40 मिनट तक तीनों अफसरों के शव सड़क पर पड़े रहे लेकिन किसी ने उनकी सुध नहीं ली। और तो और वहां से गुजरने वाली मंबई पुलिस की गाड़ी में मौजूद लोगों ने भी उन्हें देखने की जमहत तक नहीं उठाई।

मुंबई हमले को लेकर ये तीन अनसुलझे रहस्य है क्या इनकी सच्चाई क्या कभी जनता के सामने आ भी पाएगी !

(लेखक पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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